हिन्दू धर्म विभिन्न सुंदर रीति-रिवाज आ संस्कृति से भरल एक समृद्ध धर्म ह। एह धर्म के हर पर्व कवनो ना कवनो आध्यात्मिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक संदेश देवेला। ओह पर्व सभ में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण आ लोकप्रीय पर्व होली ह, जवन प्रेम, रंग, उमंग आ मेल-मिलाप के प्रतीक मानल जाला।

होली के पर्व हर साल फागुन महीना के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा के दिन मनावल जाला। ई पर्व नेपाल, भारत तथा दुनिया के अन्य देश सब में बसल हिन्दू समुदाय द्वारा बड़ा धूमधाम से मनावल जाला।
होली बसंत ऋतु में मनावल जाए वाला त्योहार ह। बसंत के आगमन के साथ प्रकृति में नवजीवन के संचार हो जाला। पेड़-पौधा में नयां कोपल फूटे लागेला, खेत में फसल लहराए लागेला, आ वातावरण में खुशहाली भर जाला। एह नव ऊर्जा के उत्सव के रूप में होली मनावल जाला।
होली के पूर्व संध्या पर होलीका दहन (कहीं-कहीं सेमत जरावल) के परंपरा बा। ई आयोजन रात में होला। परंपरागत रूप से कई जगह पर होलीका दहन में केवल पुरुष वर्ग के शामिल होखे के चलन बा। कुछ लोग एकरा के भेदभाव के नजर से देखेला, लेकिन लोकमान्यता के अनुसार एकर संबंध स्त्री सम्मान से जुड़ल मानल जाला। काहे कि होलीका स्वयं एक स्त्री रहली आ उनका दुष्टता के कारण उनका दहन भइल। साथ ही होलीका दहन रात में होला आ एह दौरान कई जगह पर व्यंग्यात्मक आ गारी गीत गावल जाला, एह कारण स्त्री लोग के दूर रखे के परंपरा बनल।

होली के संबंध पुराणिक कथा से भी जुड़ल बा। त्रेता युग में भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के कथा से होली के शुरुआत मानल जाला। प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप अपना पुत्र के भगवान विष्णु के भक्ति से नाराज रहले। ऊ कई बार प्रह्लाद के मार डाले के प्रयास कइले। अंत में उनकर बहिन होलीका, जिनका अग्नि से ना जरे के वरदान मिलल रहे, प्रह्लाद के गोद में लेके आग में बैठ गइली। लेकिन भगवान के कृपा से प्रह्लाद बच गइले आ होलीका स्वयं जल के भस्म हो गइली।
एह घटना के बाद भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में प्रकट होके हिरण्यकश्यप के वध कइले। एह प्रकार सत्य के असत्य पर विजय के प्रतीक के रूप में होलीका दहन मनावल जाला। एह पर्व के उल्लेख नारद पुराण आ भविष्य पुराण में भी मिलेला।
होलीका दहन के अग्नि के दिशा के महत्व
लोकविश्वास अनुसार होलीका दहन के समय अग्नि के लपट जवन दिशा में झुकेला, उ भविष्य के संकेत देवेला
पूर्व दिशा: शुभ संकेत। शिक्षा, अध्यात्म आ धर्म के उन्नति, रोजगार के अवसर आ जनस्वास्थ्य में सुधार के संभावना।
पश्चिम दिशा: पशुधन आ आर्थिक लाभ के संकेत, लेकिन प्राकृतिक चुनौती के भी संभावना।
उत्तर दिशा: सुख-शांति आ समृद्धि के प्रतीक। उत्तर दिशा धन के देवता से जुड़ल मानल जाला, एहसे आर्थिक प्रगति के संकेत।
दक्षिण दिशा: अशुभ संकेत। रोग, विवाद, दुर्घटना आ अशांति के संभावना।
अगर अग्नि सीधा ऊपर उठे त ओकरा के अत्यंत शुभ मानल जाला।
श्रीकृष्ण आ होली
होली के संबंध श्रीकृष्ण के लीलन से भी बा। मान्यता अनुसार बाल्यकाल में कृष्ण द्वारा पुतना वध के घटना के बाद गोकुल में उत्सव मनावल गइल। वृंदावन आ मथुरा क्षेत्र में आज भी रंगभरी होली विशेष रूप से मनावल जाला।

नीला रंग मानवता आ धैर्य के प्रतीक ह, पीयर रंग लड्डू गोपाल के प्रिय मानल जाला, जबकि लाल रंग सौभाग्य आ प्रेम के प्रतीक ह।
होली के सामाजिक महत्व
होली आपसी दुश्मनी मिटावे के पर्व ह। लोग पुरान गिला-शिकवा भुला के एक-दूसरा के अबीर-गुलाल लगावेला। समाज में भाईचारा, प्रेम आ सद्भाव के भावना बढ़ेला।
एह दिन स्वादिष्ट पकवान बनावल जाला। पुवा, गुजिया, दही-बड़ा, मालपुआ जइसन व्यंजन घर-घर में तैयार होला। खासकर पुवा भोजपुरिया क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध बा।
फगुवा गीत के परंपरा
होली के अवसर पर फगुवा गीत गावल जाला। ई गीत प्रेम, भक्ति, विरह, हास्य आ ठिठोली से भरल होला। परंपरा अनुसार होली के शुरुआत भगवान के स्मरण से होला। जइसे
“सिया चलली अवधवा के ओर, होरी खेले राम लला।”
एह गीत में सीता आ राम के होली खेलत दर्शावल जाला, जवन श्रद्धा आ भक्ति के प्रतीक ह।
होली में जोगिरा, व्यंग्य आ हास्य गीत के विशेष महत्व बा। एह दिन केहु अगर मजाक में कुछ कह देवे त लोग बुरा ना मानेला।
होली खाली रंग के त्योहार ना ह, बल्कि ई आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक एकता आ सांस्कृतिक समृद्धि के पर्व ह। ई हमनी के सिखावेला कि बुराई चाहे कतना शक्तिशाली काहे ना होखे, अंत में जीत सच्चाई आ भक्ति के ही होला।
रंग, उमंग, प्रेम आ सद्भाव के संदेश देवे वाला होली सच में हिन्दू संस्कृति के सुंदर झलक प्रस्तुत करेला।
— प्रिया मिश्र “मन्नु” ✍️